Saturday, November 14, 2015

पता नहीं, काली पूजा, जो दीपावली एवं दिवाली भी कहलाती है, मुझे इतना कष्ट क्यों देता है. केवल मैं हि तो नहीं हूँ अकेला चैनपुर वासी, १० नवम्बर हुआ नहीं, लगा की काली पूजा में गाँव पहुँच गए है. घर में बैठा हूँ इतनी दूर दिल्ली में, लग रहा है की गाँव में बैठकर, काली पूजा की तैयारी में हूँ, उका-पाती के लिए खर और संठी का इंतजाम करना है. इतनी उम्र हो गयी, लेकिन अपने से उका -पती बनाना नहीं सीखा. काका के पास बैठकर देखता हूँ या फिर पिताजी के पास, और देखता हूँ, कलाकारी उका पाती के पीछे की. घर में सारे परेशान हैं मुझे देखकर, कहते है जब इतनी हि परेशानी होती है तो चले जाते हमें छोड़ कर, रहकर तो और भी मूड ऑफ कर रहे हैं. मुझे अपने पर एकदम्मे कण्ट्रोल नहीं हो प् रहा है. रह-रहकर गाँव पहुँच जाता हूँ. लैपटॉप खोलकर फेसबुक पर लॉग इन करके सुबह से हि छोड़ दिया हूँ, गाम के आयोजन एवं आनंद को दिल-दिमाग एवं आँख से भोगने के लिए. दीवाली की रात तो दिल्ली में मुझे वैसे हि परेशान कर देता है. गाँव के याद हर पल हर क्षण  दिलाता है. इस बार भी नहीं जा पाया. कभी-२ लगता है के मैं इतना बुरबक हूँ, लेकिन फिर सोचता हूँ की कुछ ज्यादा हि सेंटी हूँ, पता नहीं क्या हूँ, लेकिन गाँव बहुत याद आता है.