Tuesday, May 16, 2023

 कितने दिनों के बाद यहाँ पर आया हूँ.  मन बेचैन सा रहता है. पहली बार जब यहाँ पर आया था तबसे आठ साल हो गए हैं. कितना कुछ बदल गया मेरे जीवन में. काकू (मेरे पिताजी की चाची) कम उम्र में ही चेचक के कारण अपना दोनों आँखे खो बैठी थी, बहुत प्यार करती थी मुझे. लगभग ९५ साल की उम्र में परलोकवासी हो गयी २०१८ में. एक साल भी तो नहीं बीता होगा, अक्तूबर २०१९ में बाबूजी कैंसर से जूझते हुए अनाथ कर गए हम लोगों को. ऊपर वाले के लिए ये कम ही रहा होगा क्योंकि माता (दाय कहते थे हम) दिसम्बर २०२० में पिताजी के पास चली गयी हमें टुअर करके.  लगभग दो साल बीते ही थे, चाचा (लाल बाबु) की भी विदाई की घड़ी आ गयी फ़रवरी २०२३ में. युवा वर्ग जहाँ वैलेंटाइन डे मना रहे थे, मैं अपने लाल बाबु की यादों में रो रहा था. एक सदमा सा लगा था .  एक एक करके विकेट गिर रहे हैं . दबाब बढ़ रहा है. इन सबका प्रभाव मेरे स्वास्थ्य पर परिलक्षित होने लगा. कभी कभी थोड़ा चलने पर ही दम घुटने जैसा महसूस होता था.  दिल की बीमारी की आशंका व्यक्त की डॉक्टरों ने. मैं अन्दर से डर सा गया .

आखिरकार, डॉक्टर की बात मनानी ही पड़ी. एंजियोग्राफी और उसके बाद एंजियोप्लास्टी के प्रक्रिया से गुजरना पड़ा. कारण था - आर्टरी में ब्लॉकेज. जान बचाने के लिए करना ही पड़ा.

कुछ कमजोर सा महसूस करने लगा हूँ. कुछ कमी सी महसूस होती है. लगता है शायद पहले जैसा नहीं रह गया हूँ. वैसे पिछले दो महीने से दवाई ले रहा हूँ और यथासाध्य परहेज भी कर रहा हूँ.  अब बेहतर लग रहा हूँ.

वैसे २०२३ में कुछ ना कुछ लगातार अशुभ होता ही आ रहा है. फ़रवरी में चाचा चले गए, तो मार्च में मेरी सासू माँ कुछ ज्यादा ही बीमार हो गयी. और फिर परसों की ही बात है मेरे बहनोई बिजली झा का भयंकर एक्सीडेंट हो गया है और पटना में एक अस्पताल में जूझ रहे हैं. दुर्भाग्य ऐसा की अभी मैं अपने को उतना स्वस्थ नहीं महसूस कर रहा हूँ की उन दोनों को देखने जा सकूं.

ये सब देखते हुए लग रहा है  की मेरी परीक्षा ली जा रही है.  जीवन तो एक परीक्षा है ही. जूझना तो पड़ेगा ही. शायद यही जीवन है.

Saturday, November 14, 2015

पता नहीं, काली पूजा, जो दीपावली एवं दिवाली भी कहलाती है, मुझे इतना कष्ट क्यों देता है. केवल मैं हि तो नहीं हूँ अकेला चैनपुर वासी, १० नवम्बर हुआ नहीं, लगा की काली पूजा में गाँव पहुँच गए है. घर में बैठा हूँ इतनी दूर दिल्ली में, लग रहा है की गाँव में बैठकर, काली पूजा की तैयारी में हूँ, उका-पाती के लिए खर और संठी का इंतजाम करना है. इतनी उम्र हो गयी, लेकिन अपने से उका -पती बनाना नहीं सीखा. काका के पास बैठकर देखता हूँ या फिर पिताजी के पास, और देखता हूँ, कलाकारी उका पाती के पीछे की. घर में सारे परेशान हैं मुझे देखकर, कहते है जब इतनी हि परेशानी होती है तो चले जाते हमें छोड़ कर, रहकर तो और भी मूड ऑफ कर रहे हैं. मुझे अपने पर एकदम्मे कण्ट्रोल नहीं हो प् रहा है. रह-रहकर गाँव पहुँच जाता हूँ. लैपटॉप खोलकर फेसबुक पर लॉग इन करके सुबह से हि छोड़ दिया हूँ, गाम के आयोजन एवं आनंद को दिल-दिमाग एवं आँख से भोगने के लिए. दीवाली की रात तो दिल्ली में मुझे वैसे हि परेशान कर देता है. गाँव के याद हर पल हर क्षण  दिलाता है. इस बार भी नहीं जा पाया. कभी-२ लगता है के मैं इतना बुरबक हूँ, लेकिन फिर सोचता हूँ की कुछ ज्यादा हि सेंटी हूँ, पता नहीं क्या हूँ, लेकिन गाँव बहुत याद आता है.