कितने दिनों के बाद यहाँ पर आया हूँ. मन बेचैन सा रहता है. पहली बार जब यहाँ पर आया था तबसे आठ साल हो गए हैं. कितना कुछ बदल गया मेरे जीवन में. काकू (मेरे पिताजी की चाची) कम उम्र में ही चेचक के कारण अपना दोनों आँखे खो बैठी थी, बहुत प्यार करती थी मुझे. लगभग ९५ साल की उम्र में परलोकवासी हो गयी २०१८ में. एक साल भी तो नहीं बीता होगा, अक्तूबर २०१९ में बाबूजी कैंसर से जूझते हुए अनाथ कर गए हम लोगों को. ऊपर वाले के लिए ये कम ही रहा होगा क्योंकि माता (दाय कहते थे हम) दिसम्बर २०२० में पिताजी के पास चली गयी हमें टुअर करके. लगभग दो साल बीते ही थे, चाचा (लाल बाबु) की भी विदाई की घड़ी आ गयी फ़रवरी २०२३ में. युवा वर्ग जहाँ वैलेंटाइन डे मना रहे थे, मैं अपने लाल बाबु की यादों में रो रहा था. एक सदमा सा लगा था . एक एक करके विकेट गिर रहे हैं . दबाब बढ़ रहा है. इन सबका प्रभाव मेरे स्वास्थ्य पर परिलक्षित होने लगा. कभी कभी थोड़ा चलने पर ही दम घुटने जैसा महसूस होता था. दिल की बीमारी की आशंका व्यक्त की डॉक्टरों ने. मैं अन्दर से डर सा गया .
आखिरकार, डॉक्टर की बात मनानी ही पड़ी. एंजियोग्राफी और उसके बाद एंजियोप्लास्टी के प्रक्रिया से गुजरना पड़ा. कारण था - आर्टरी में ब्लॉकेज. जान बचाने के लिए करना ही पड़ा.
कुछ कमजोर सा महसूस करने लगा हूँ. कुछ कमी सी महसूस होती है. लगता है शायद पहले जैसा नहीं रह गया हूँ. वैसे पिछले दो महीने से दवाई ले रहा हूँ और यथासाध्य परहेज भी कर रहा हूँ. अब बेहतर लग रहा हूँ.
वैसे २०२३ में कुछ ना कुछ लगातार अशुभ होता ही आ रहा है. फ़रवरी में चाचा चले गए, तो मार्च में मेरी सासू माँ कुछ ज्यादा ही बीमार हो गयी. और फिर परसों की ही बात है मेरे बहनोई बिजली झा का भयंकर एक्सीडेंट हो गया है और पटना में एक अस्पताल में जूझ रहे हैं. दुर्भाग्य ऐसा की अभी मैं अपने को उतना स्वस्थ नहीं महसूस कर रहा हूँ की उन दोनों को देखने जा सकूं.
ये सब देखते हुए लग रहा है की मेरी परीक्षा ली जा रही है. जीवन तो एक परीक्षा है ही. जूझना तो पड़ेगा ही. शायद यही जीवन है.
No comments:
Post a Comment